श्री भगवान ने कहा – तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं, ओर फिर भी विद्वानों की तरह बात कर रहे हो। जो वास्तव में पण्डित हैं, वे न तो मृत के लिए और न ही जीवित के लिए शोक करते हैं।
व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.११ के आधार पर 'प्रज्ञावाद' (प्रज्ञावादांश्च भाषसे) और 'पंडित' (नानुशोचन्ति पण्डिताः) की क्या दार्शनिक व्याख्या की गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'प्रज्ञावाद' केवल मुख से कही गई बातें हैं जो आचरण में नहीं उतरतीं। इसके अतिरिक्त, केवल जन्म से ब्राह्मण होने से कोई पंडित नहीं बन जाता; जन्मगत धारणा सामाजिक है, शास्त्रीय नहीं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'प्रज्ञावाद' का तात्पर्य केवल ज्ञान की बातें दोहराना है बिना उन्हें जीवन में उतारे। 'पंडित' शब्द 'पंडा' से बना है जिसका अर्थ है सत्-असत् तथा शरीर और आत्मा का विवेक करने वाली बुद्धि। ऐसा ज्ञानवान व्यक्ति जानता है कि आत्मा अमर है और शरीर नश्वर, इसलिए वह गतासु (मृत) या अगतासु (जीवित) किसी के लिए भी शोक नहीं करता।
श्लोक २.१२ ("न त्वेवाहं जातु नासं...") में भगवान श्री कृष्ण द्वारा प्रयुक्त दोहरे 'नकार' (Double Negation) का क्या दार्शनिक महत्त्व है, और काल (Time) का आत्मा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता के अनुसार संस्कृत व्याकरण के नियम से दो नकार (ध्वंसाभाव व प्रागभाव का निषेध) किसी वस्तु की नित्य सत्ता को बतलाते हैं, जिसका अर्थ है कि आत्मा सदैव ही विद्यमान थी। आत्मा पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि काल केवल भौतिक पदार्थों के नाम और रूप को परिवर्तित करता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा अनादि और नित्य है; उसका न तो कोई नया आरंभ (बिगिनिंग) होता है और न ही काल द्वारा उसका कोई विनाश संभव है।