भ. गी. 2.17
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
अनुवाद
किंतु जिससे यह सम्पूर्ण देह व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो । इस अव्यय [आत्मा] का विनाश कोई नहीं कर सकता है ।
किंतु जिससे यह सम्पूर्ण देह व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो । इस अव्यय [आत्मा] का विनाश कोई नहीं कर सकता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार न्याय शास्त्र के नियम से मध्यम परिमाण वाली वस्तु विनाशी होती है, तथा आत्मा का आकार शरीर के अनुसार घटता-बढ़ता नहीं है (यह जैन मत की धारणा है जिसका खंडन किया गया है)।
विकल्प ख (सही): वक्ता उपनिषद के प्रमाण ("बालाग्रशतभागस्य...") का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि वैष्णव मत में आत्मा 'अणु' परिमाण की है जो हृदय देश में स्थित होकर, कमरे में रखे बल्ब के प्रकाश की भाँति, अपनी चेतना शक्ति से संपूर्ण शरीर में व्याप्त होती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'शरीर' का शाब्दिक अर्थ ही 'शीर्यते' (जो क्षीण या जीर्ण-शीर्ण हो जाए) है, अतः शरीर का नष्ट होना उसका सहज धर्म है। आत्मा के लिए 'अनाशी' का तात्पर्य नाश न होने के साथ-साथ यह भी है कि वह असन (भोजन) नहीं करता, इसलिए भौतिक भोजन से शरीर तो बढ़ता है पर आत्मा सदा एक-रस रहती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि शरीर अजर-अमर नहीं बल्कि नश्वर है, तथा आत्मा भौतिक भोजन का उपभोग करके घटती-बढ़ती नहीं है
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।