भ. गी. 2.18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥

अनुवाद

नित्य, अविनाशी और अप्रमेय देही के इन सभी देहों को नाशवान कहा गया है । अतः, हे भरतवंशी ! युद्ध करो ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक २.१७ ("अविनाशि तु तद्विद्धि...") की व्याख्या में वैष्णवाचार्यों के अनुसार आत्मा के परिमाण (आकार) और उसके पूरे शरीर में व्याप्त होने की प्रक्रिया का क्या शास्त्रीय सिद्धांत बताया गया है?

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