भ. गी. 2.19
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
अनुवाद
जो इसे (आत्मा को) हत्यारा मानता है और जो उसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों अज्ञानी हैं, क्योंकि आत्मा न हत्या करता है न उसकी हत्या होती है ।
जो इसे (आत्मा को) हत्यारा मानता है और जो उसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों अज्ञानी हैं, क्योंकि आत्मा न हत्या करता है न उसकी हत्या होती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अपराधी कोई ज्ञानी नहीं था, बल्कि एक चतुर व्यक्ति था जो केवल दंड से बचने के लिए शास्त्र के वचनों को अपने स्तर पर खींचकर दुरुपयोग कर रहा था।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि वास्तविक ज्ञानी व्यक्ति राग-द्वेष से ऊपर उठकर कार्य करता है और कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता। जो व्यक्ति अपने स्वार्थ और अपराध को न्यायसंगत (justified) बताने के लिए शास्त्र का सहारा लेता है, वह अज्ञानी ही है। न्यायाधीश ने भी उसके इसी दोहरे आचरण (सुंदर घर व बगीचे का श्रेय स्वयं लेना परंतु हत्या के समय 'मैं कर्ता नहीं हूँ' का बहाना बनाना) को उजागर करके उसे दंडित किया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि छहों विकार केवल भौतिक शरीर और नश्वर पदार्थों में होते हैं, आत्मा में नहीं। इसके अतिरिक्त आत्मा के कोई टुकड़े या अवयव नहीं होते।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार निरुक्त ग्रंथ में भौतिक पदार्थों के छह विकार या परिणाम बताए गए हैं (उत्पन्न होना, अस्तित्व में आना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना), जबकि आत्मा इन विकारों से पूरी तरह परे है। साथ ही न्याय शास्त्र का सिद्धांत है कि विनाश केवल उन्हीं वस्तुओं का हो सकता है जो टुकड़ों/अवयवों से मिलकर बनी हों; चूँकि आत्मा अवयवविहीन है, इसलिए इसका विनाश संभव नहीं है।
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