भ. गी. 2.20

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

अनुवाद

यह न कभी जन्म लेता है और न ही मरता है। यह एक बार होने के पश्चात् कभी भी पुनः होने वाला नहीं है । यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है । शरीर की हत्या होने पर उस (आत्मा) की हत्या नहीं होती है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.१९ ("य एनं वेत्ति हंतारं...") के आधार पर दिए गए न्यायाधीश और अपराधी के दृष्टांत के अनुसार, "आत्मा मरती नहीं, इसलिए किसी को मारने में कोई पाप नहीं है" ऐसा कहना क्यों अज्ञानता और शास्त्र का दुरुपयोग माना गया है?

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