न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
अनुवाद
यह न कभी जन्म लेता है और न ही मरता है। यह एक बार होने के पश्चात् कभी भी पुनः होने वाला नहीं है । यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है । शरीर की हत्या होने पर उस (आत्मा) की हत्या नहीं होती है ।
व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.१९ ("य एनं वेत्ति हंतारं...") के आधार पर दिए गए न्यायाधीश और अपराधी के दृष्टांत के अनुसार, "आत्मा मरती नहीं, इसलिए किसी को मारने में कोई पाप नहीं है" ऐसा कहना क्यों अज्ञानता और शास्त्र का दुरुपयोग माना गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अपराधी कोई ज्ञानी नहीं था, बल्कि एक चतुर व्यक्ति था जो केवल दंड से बचने के लिए शास्त्र के वचनों को अपने स्तर पर खींचकर दुरुपयोग कर रहा था।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि वास्तविक ज्ञानी व्यक्ति राग-द्वेष से ऊपर उठकर कार्य करता है और कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता। जो व्यक्ति अपने स्वार्थ और अपराध को न्यायसंगत (justified) बताने के लिए शास्त्र का सहारा लेता है, वह अज्ञानी ही है। न्यायाधीश ने भी उसके इसी दोहरे आचरण (सुंदर घर व बगीचे का श्रेय स्वयं लेना परंतु हत्या के समय 'मैं कर्ता नहीं हूँ' का बहाना बनाना) को उजागर करके उसे दंडित किया।
श्लोक २.२० ("न जायते म्रियते वा कदाचित्...") की व्याख्या में निरुक्त शास्त्र के अनुसार बताए गए 'छह विकारों' तथा न्याय दर्शन के आधार पर आत्मा के नित्य होने का क्या दार्शनिक प्रमाण दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि छहों विकार केवल भौतिक शरीर और नश्वर पदार्थों में होते हैं, आत्मा में नहीं। इसके अतिरिक्त आत्मा के कोई टुकड़े या अवयव नहीं होते।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार निरुक्त ग्रंथ में भौतिक पदार्थों के छह विकार या परिणाम बताए गए हैं (उत्पन्न होना, अस्तित्व में आना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना), जबकि आत्मा इन विकारों से पूरी तरह परे है। साथ ही न्याय शास्त्र का सिद्धांत है कि विनाश केवल उन्हीं वस्तुओं का हो सकता है जो टुकड़ों/अवयवों से मिलकर बनी हों; चूँकि आत्मा अवयवविहीन है, इसलिए इसका विनाश संभव नहीं है।