भ. गी. 2.21
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥
अनुवाद
हे पार्थ ! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा, और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या मरवा सकता है ?
हे पार्थ ! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा, और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या मरवा सकता है ?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार आत्मा वाणी या भौतिक संकेतों से शरीर को कोई प्रत्यक्ष आदेश नहीं देती और न ही वह प्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार कार्य करवाती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि आत्मा अपनी 'सन्निधि मात्र' (केवल उपस्थिति) से शरीर, मन और इंद्रियों को चेतन कर देती है। जिस प्रकार कक्षा में शिक्षक की केवल उपस्थिति से शांति छा जाती है, उसी प्रकार आत्मा की उपस्थिति मात्र से शरीर में चेतना का संचार होता है और शरीर अपने संस्कारों के अनुसार कार्य करने लगता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वस्त्र की भाँति शरीर केवल पुराना ('जीर्ण') होने पर ही नहीं छोड़ा जाता, बल्कि यदि शरीर क्षत-विक्षत ('शीर्ण') हो जाए या आत्मा के प्रारब्ध-कर्मों का फल भोगने के उपयोगी न रहे, तो आत्मा उसे त्यागकर नया शरीर (देहांतर) प्राप्त करती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि मृत्यु संयोग या अकारण नहीं होती, बल्कि वह व्यक्ति के प्रारब्ध-कर्म और उस शरीर की उपयोगिता समाप्त होने के नियम से जुड़ी होती है।
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