भ. गी. 2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

अनुवाद

जिस प्रकार व्यक्ति जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही (आत्मा) जीर्ण शरीरों को त्यागकर अन्य नए शरीरों में प्रवेश करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.२१ ("वेदाविनाशिनं नित्यं...") में जब भगवान कहते हैं कि आत्मा न मारती है और न किसी से मरवाती है, तो यह प्रश्न उठने पर कि फिर जड़ शरीर कैसे कार्य करता है, वक्ता द्वारा आत्मा के 'प्रयोजक कर्ता' होने का क्या सूक्ष्म उत्तर दिया गया है?

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