भ. गी. 2.23
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
अनुवाद
न शस्त्र इसे (आत्मा को) काट सकते हैं, न ही अग्नि इसे जला सकती है; न ही जल इसे भीगा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है ।
न शस्त्र इसे (आत्मा को) काट सकते हैं, न ही अग्नि इसे जला सकती है; न ही जल इसे भीगा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में आत्मा को प्रकृति का विकार नहीं बल्कि प्रकृति से परे और अप्राकृतिक बताया गया है। इसके अतिरिक्त, कैटालिस्ट या आत्मा अभिक्रिया में स्वयं नष्ट नहीं होते, बल्कि पूर्णतः अविकारी बने रहते हैं।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार अस्त्र-शस्त्र आदि पृथ्वी आदि तत्वों के विकार हैं जो केवल विकारी और अवयव-युक्त (टुकड़ों वाली) वस्तुओं पर ही प्रभाव डाल सकते हैं। चूँकि आत्मा निरवयव और अप्राकृतिक है, इसलिए इस पर छेदन या दहन क्रिया संभव नहीं है। रसायन विज्ञान के कैटालिस्ट के दृष्टांत द्वारा समझाया गया है कि जैसे कैटालिस्ट स्वयं अविकारी रहकर अभिक्रिया को संभव बनाता है, वैसे ही आत्मा अपनी केवल उपस्थिति (सन्निधि) मात्र से प्रकृति में विकार उत्पन्न करती है परंतु स्वयं अविकारी रहती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अद्वैत वेदांत आत्मा को विभू मानता है जबकि वैष्णव आचार्य इसे अणु मानते हैं। इसके अलावा मृत्यु के समय आत्मा नष्ट नहीं होती, बल्कि सूक्ष्म शरीर के आश्रित होकर नया शरीर धारण करती है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार वैष्णव दर्शन में आत्मा को 'अणु' परिमाण वाला माना गया है। श्री रामानुजाचार्य जी के अनुसार 'सर्वगत' का अर्थ है कि अणु होने के कारण आत्मा बिना किसी रुकावट के सभी प्रकार की वस्तुओं व शरीरों में प्रवेश कर सकती है। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के अनुसार यह एक स्थान पर रहकर अपनी चेतना से संपूर्ण शरीर को व्याप्त रखती है। आत्मा के 'अचल' होने का अर्थ यह है कि आत्मा स्वयं नहीं चलती, बल्कि सूक्ष्म शरीर (प्राण आदि) उसे एक देह से दूसरे देह में ले जाता है।
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