भ. गी. 2.58
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
अनुवाद
जब मुनि अपने सभी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से इस प्रकार पूरी तरह खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कचकडे़ (खोल) में समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ।
जब मुनि अपने सभी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से इस प्रकार पूरी तरह खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कचकडे़ (खोल) में समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'स्नेह' का मूल अर्थ घी/तेल जैसे चिकने पदार्थ से है जो आसक्ति रूपी गोंद का काम करता है। जिस प्रकार दीपक तेल से जलता है, उसी प्रकार स्नेह के कारण मनुष्य चिंता में जलता रहता है। ज्ञान मार्ग में ज्ञानी का सर्वत्र वैराग्य होता है, परंतु भक्ति मार्ग में 'सर्वत्र अनभिसनेह' का तात्पर्य केवल भौतिक/अ-भगवदीय आसक्ति का त्याग है, जबकि भगवान और उनसे संबंधित विषयों में प्रीति/स्नेह बनाए रखना भक्ति का मूल सिद्धांत है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अति-आसक्ति रूपी स्नेह एक तामसिक वृत्ति है जो चिंता और मोह उत्पन्न करती है। इसके अतिरिक्त भक्ति मार्ग में भगवान और भक्तों से विरक्त होने का उपदेश नहीं है, बल्कि भौतिक विषयों से अनासक्त होने की बात कही गई है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट खंडन किया गया है कि इंद्रियों का विनाश (जैसे सूरदास द्वारा आँखें फोड़ने की कथा का उदाहरण) कोई वास्तविक समाधान नहीं है, क्योंकि भगवान ने इंद्रियाँ नष्ट करने के लिए नहीं दी हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि कछुआ अपने ६ अंगों (४ पैर, मुँह, पूँछ) को आवश्यकतानुसार बाहर निकालता और समेट लेता है; वैसे ही स्थितप्रज्ञ ५ ज्ञानेंद्रियों व १ मन को अपने वश में रखता है। यदि कोई आँख फोड़ ले या भोजन छोड़कर शरीर सुखा दे, तो उससे केवल बाह्य माध्यम नष्ट होता है, जबकि मन में स्थित वासना भूत की तरह अंदर तड़पाती रहती है। अतः असली हल इंद्रिय-विनाश नहीं बल्कि विवेकपूर्ण नियंत्रण है।
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