यद्यपि संयम का अभ्यास करता हुआ व्यक्ति इंद्रियविषयों का त्याग कर दे, फिर भी उनमें उसकी आसक्ति बनी रहती है । परंतु जब उसे परब्रह्म [अर्थात् भगवान] का साक्षात्कार होता है, तब उसकी यह आसक्ति भी चली जाती है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.५९ ("विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः...") में बाह्य विषय-त्याग (निराहार) और वास्तविक 'रस-निवृत्ति' (आसक्ति के नाश) के बीच क्या अंतर समझाया गया है, तथा इसे सिद्ध करने के लिए नट (जड़ समाधि) व उपनिषद के १५ दिन के उपवास का क्या दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि कंप्यूटर की हार्ड डिस्क की भाँति जब तक चित्त में संस्कार रहते हैं, तब तक बाह्य विषय छोड़ने (निराहार रहने) पर भी राग/रस समाप्त नहीं होता। जैसे ६ महीने की जड़ समाधि लगाने वाला नट उठते ही अपने ५ गाँव और हाथी माँगने लगा (उसका आंतरिक राग बना रहा) तथा उपवास करने वाले शिष्य की इंद्रियाँ भोजन मिलते ही पुनः दौड़ने लगीं। बाह्य विषयों से आसक्ति केवल तभी छूटती है जब साधक को 'परं दृष्ट्वा' (भगवद्भक्ति से उत्कृष्ट व अक्षय रस) की अनुभूति होती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि उपवास या बाह्य निरोध से विषय-आसक्ति सदा के लिए नष्ट नहीं होती, और न ही नट की जड़ समाधि वास्तविक मोक्ष या राग-मुक्ति थी, बल्कि वह केवल एक भौतिक कला/निरोध था।
भगवद्गीता के श्लोक २.६० ("यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः...") की व्याख्या में 'विपश्चितः' (प्रबुद्ध साधक) का मन बलपूर्वक हर लिए जाने का क्या कारण बताया गया है, और जैमिनी ऋषि तथा व्यास जी के प्रसंग से साधक को क्या मुख्य चेतावनी दी गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'विपश्चितः' शब्द यह दर्शाता है कि इंद्रियाँ साधारण मनुष्य की ही नहीं, बल्कि मोक्ष हेतु यत्नशील विद्वान साधक के मन को भी बलपूर्वक (प्रसभं) हर लेती हैं। जैमिनी जी को जब अपने जितेंद्रिय होने का अभिमान हुआ, तो व्यास जी द्वारा रचित मोहिनी लीला के प्रभाव से उनका मन इतना उद्वेलित हो गया कि वे छप्पर उखाड़कर कुटिया में कूद पड़े। अतः साधक को कभी अपने संयम का अभिमान नहीं करना चाहिए, बल्कि भगवान की शरण ('मामेव ये प्रपद्यन्ते') ही एकमात्र रक्षा-कवच है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि बड़े-बड़े ज्ञानी व विद्वान भी माया से मोहित हो सकते हैं, और जैमिनी जी ने स्वयं व्यास जी के चरणों में गिरकर अपनी भूल स्वीकार की थी।