भ. गी. 2.60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र ! उपद्रवी इंद्रियाँ मोक्षप्राप्ति के लिये प्रयत्नशील बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी अवश्य ही बलपूर्वक हर लेती हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.५९ ("विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः...") में बाह्य विषय-त्याग (निराहार) और वास्तविक 'रस-निवृत्ति' (आसक्ति के नाश) के बीच क्या अंतर समझाया गया है, तथा इसे सिद्ध करने के लिए नट (जड़ समाधि) व उपनिषद के १५ दिन के उपवास का क्या दृष्टांत दिया गया है?

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