भ. गी. 2.60
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र ! उपद्रवी इंद्रियाँ मोक्षप्राप्ति के लिये प्रयत्नशील बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी अवश्य ही बलपूर्वक हर लेती हैं ।
हे कुन्तीपुत्र ! उपद्रवी इंद्रियाँ मोक्षप्राप्ति के लिये प्रयत्नशील बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी अवश्य ही बलपूर्वक हर लेती हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि कंप्यूटर की हार्ड डिस्क की भाँति जब तक चित्त में संस्कार रहते हैं, तब तक बाह्य विषय छोड़ने (निराहार रहने) पर भी राग/रस समाप्त नहीं होता। जैसे ६ महीने की जड़ समाधि लगाने वाला नट उठते ही अपने ५ गाँव और हाथी माँगने लगा (उसका आंतरिक राग बना रहा) तथा उपवास करने वाले शिष्य की इंद्रियाँ भोजन मिलते ही पुनः दौड़ने लगीं। बाह्य विषयों से आसक्ति केवल तभी छूटती है जब साधक को 'परं दृष्ट्वा' (भगवद्भक्ति से उत्कृष्ट व अक्षय रस) की अनुभूति होती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि उपवास या बाह्य निरोध से विषय-आसक्ति सदा के लिए नष्ट नहीं होती, और न ही नट की जड़ समाधि वास्तविक मोक्ष या राग-मुक्ति थी, बल्कि वह केवल एक भौतिक कला/निरोध था।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'विपश्चितः' शब्द यह दर्शाता है कि इंद्रियाँ साधारण मनुष्य की ही नहीं, बल्कि मोक्ष हेतु यत्नशील विद्वान साधक के मन को भी बलपूर्वक (प्रसभं) हर लेती हैं। जैमिनी जी को जब अपने जितेंद्रिय होने का अभिमान हुआ, तो व्यास जी द्वारा रचित मोहिनी लीला के प्रभाव से उनका मन इतना उद्वेलित हो गया कि वे छप्पर उखाड़कर कुटिया में कूद पड़े। अतः साधक को कभी अपने संयम का अभिमान नहीं करना चाहिए, बल्कि भगवान की शरण ('मामेव ये प्रपद्यन्ते') ही एकमात्र रक्षा-कवच है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि बड़े-बड़े ज्ञानी व विद्वान भी माया से मोहित हो सकते हैं, और जैमिनी जी ने स्वयं व्यास जी के चरणों में गिरकर अपनी भूल स्वीकार की थी।
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