भ. गी. 2.67
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
अनुवाद
वास्तव में ऐसे व्यक्ति की विवेक-बुद्धि को भटकती हुई इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन उसी प्रकार हर लेता है, जैसे वायु जल पर नाव को उसके मार्ग से हटा देती है ।
वास्तव में ऐसे व्यक्ति की विवेक-बुद्धि को भटकती हुई इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन उसी प्रकार हर लेता है, जैसे वायु जल पर नाव को उसके मार्ग से हटा देती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान यहाँ दुःख और अशांति का पूरा क्रम बताते हैं—अयुक्त (असंयमित/ईश्वर से विमुख) व्यक्ति में स्थिर बुद्धि नहीं होती, बुद्धि न होने से भक्ति/भावना नहीं होती, और बिना भावना के मन चंचल व अशांत रहता है। अशांत मन को सुख मिलना असंभव है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अयुक्त व्यक्ति उस 'कटी पतंग' की भाँति है जिसकी डोरी कट चुकी है और वह सोशल मीडिया व तकनीक के जंगल में भटक रहा है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अयुक्त व्यक्ति में बुद्धि और भावना दोनों का अभाव होता है; अतः विकल्प ख का दावा असत्य है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है और श्लोक के वास्तविक रूपक से मेल नहीं खाती।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस प्रकार जल में बिना नाविक/सारथी के चल रही नौका को प्रचंड वायु किसी भी दिशा में बहा ले जाती है, उसी प्रकार विषयों में चरती हुई इंद्रियाँ (वायु) चंचल मन (जल) के माध्यम से मनुष्य की बुद्धि/प्रज्ञा (नौका) का हरण कर लेती हैं। यदि सारथी लगाम छोड़ दे, तो इंद्रिय रूपी अनियंत्रित घोड़े पूरे रथ को दुर्घटनाग्रस्त कर देते हैं।
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