भ. गी. 2.68
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
अनुवाद
अतः हे महाबाहो अर्जुन ! जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ अपने विषयों से पूर्णतः संयमित हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
अतः हे महाबाहो अर्जुन ! जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ अपने विषयों से पूर्णतः संयमित हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार इंद्रिय-संयम केवल शारीरिक योद्धाओं तक सीमित नहीं है, और न ही 'सर्वशः' का अर्थ केवल कुछ विशेष तिथियों या पर्वों तक सीमित संयम है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि इंद्रियों व मन की शक्ति आत्मा से ही आती है, अतः मनुष्य अपने संकल्प से इन्हें नियंत्रित कर सकता है—इसीलिए अर्जुन को 'महाबाहो' कहकर प्रोत्साहित किया गया है। 'सर्वशः' शब्द का अर्थ है कि संयम सार्वभौम होना चाहिए—सभी विषयों में, सभी स्थानों पर, सभी काल में और हर वर्ण व आश्रम के साधक के लिए अनिवार्य है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या श्लोक के वास्तविक अर्थ के पूर्णतः विपरीत है; ज्ञानी मुनि भौतिक अर्थ और काम में नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना में जागता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि साधारण जीवों की चेतना मुख्य रूप से 'अर्थ' और 'काम' (धन व भोग) में केंद्रित रहती है, जो मुनि के लिए रात्रि (अज्ञान/अंधकार) के समान है। इसके विपरीत, ईश्वर-चिंतन और भक्ति का जो मार्ग आम जीवों के लिए रात्रि जैसा है, उसमें संयमी मुनि सदा जागरूक रहता है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।