संयमी व्यक्ति उस [आध्यात्मिक चेतना] के प्रति जाग्रत रहता है जो सभी बद्धजीवों के लिये रात्री* है । [इसी प्रकार] सभी बद्धजीव उस [भौतिकवादी चेतना] के प्रति जाग्रत रहते हैं जो साक्षात्कारी मुनि के लिये रात्री है ।
टिप्पणियाँ
* यहाँ रात्रि का आशय उस विषय में रुचि अथवा जागरूकता का अभाव है, जिसमें अन्य लोगों की रुचि तल्लीन रहती है। जागते रहने का अर्थ उस विषय के प्रति जागरूक होना है, जिसके प्रति अन्य लोग सोए हुए हैं। कृष्ण यह बता रहे हैं कि आध्यात्मिक रूप से जाग्रत और आध्यात्मिक रूप से सुप्त लोगों की रुचियाँ दिन और रात की भाँति परस्पर विपरीत होती हैं।
भगवद्गीता के श्लोक २.६८ ("तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः...") की व्याख्या में भगवान द्वारा अर्जुन को 'महाबाहो' सम्बोधन दिए जाने का क्या विशेष रहस्य बताया गया है, तथा 'सर्वशः' शब्द के अंतर्गत इंद्रिय-संयम का क्या दायरा स्पष्ट किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार इंद्रिय-संयम केवल शारीरिक योद्धाओं तक सीमित नहीं है, और न ही 'सर्वशः' का अर्थ केवल कुछ विशेष तिथियों या पर्वों तक सीमित संयम है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि इंद्रियों व मन की शक्ति आत्मा से ही आती है, अतः मनुष्य अपने संकल्प से इन्हें नियंत्रित कर सकता है—इसीलिए अर्जुन को 'महाबाहो' कहकर प्रोत्साहित किया गया है। 'सर्वशः' शब्द का अर्थ है कि संयम सार्वभौम होना चाहिए—सभी विषयों में, सभी स्थानों पर, सभी काल में और हर वर्ण व आश्रम के साधक के लिए अनिवार्य है।
भगवद्गीता के श्लोक २.६९ ("या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी...") में 'निशा' (रात्रि) और 'जागरण' (दिन) के रूपक द्वारा संयमी मुनि और साधारण बद्ध जीवों की चेतना का क्या मूलभूत अंतर समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या श्लोक के वास्तविक अर्थ के पूर्णतः विपरीत है; ज्ञानी मुनि भौतिक अर्थ और काम में नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना में जागता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि साधारण जीवों की चेतना मुख्य रूप से 'अर्थ' और 'काम' (धन व भोग) में केंद्रित रहती है, जो मुनि के लिए रात्रि (अज्ञान/अंधकार) के समान है। इसके विपरीत, ईश्वर-चिंतन और भक्ति का जो मार्ग आम जीवों के लिए रात्रि जैसा है, उसमें संयमी मुनि सदा जागरूक रहता है।