आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
अनुवाद
जैसे अनेक नदीयाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, और समुद्र पूर्णतः भरा हुआ होने पर भी अपनी सीमा में स्थिर रहता है, उसी प्रकार जिस मुनि में समस्त भोग प्रवेश करते हैं [परन्तु उसके मन में विकार नहीं लाते], वह शान्ति प्राप्त करता है, न कि वह जो भोगों की लालसा करता है ।
भगवद्गीता के श्लोक २.७० ("आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्...") की व्याख्या में 'समुद्र' और 'नदियों' के दृष्टांत द्वारा शांत और अशांत व्यक्ति के बीच क्या दार्शनिक अंतर समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार समुद्र का जल-स्तर नदियों के आने से उफनता नहीं है और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति विषयों के पीछे नहीं दौड़ता।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि समुद्र इतना विशाल है कि उसमें नदियों का जल समाने पर भी वह मर्यादा नहीं लांघता और न ही नदियों के पीछे दौड़ता है। उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के पास प्रारब्ध-वश विषय आते हैं पर वे उसकी बुद्धि को विचलित नहीं करते। इसके विपरीत, 'कामकामी' (विषयों की कामना करने वाला) कभी शांत नहीं रह सकता।
भगवद्गीता के श्लोक २.७१ व २.७२ की व्याख्या के अनुसार, परम शांति हेतु त्याग की जाने वाली चार वस्तुओं (कामना, स्पृहा, ममता, अहंकार) का सूक्ष्मता का क्रम क्या है, तथा 'ब्राह्मी स्थिति' और 'खटवांग राजा' के दृष्टांत से क्या मुख्य निष्कर्ष निकलता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अहंकार सबसे सूक्ष्म (आंतरिक) है, उससे ममता पैदा होती है, फिर स्पृहा और सबसे स्थूल कामना है। श्लोक २.७२ में 'एषा ब्राह्मी स्थितिः' को जीवन-मुक्त अवस्था कहा गया है। यदि यह स्थिति अंतकाल में भी प्राप्त हो जाए (जैसे राजा खटवांग को देवताओं से आयु का ज्ञान होने पर अंतिम क्षणों में प्रभु-चिंतन से मिली थी), तो व्यक्ति को ब्रह्म-निर्वाण प्राप्त होता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अहंकार सबसे सूक्ष्म है। इसके अतिरिक्त श्लोक में 'स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि' कहकर स्पष्ट किया गया है कि अंतकाल में भी यह स्थिति मिलने पर मोक्ष प्राप्त हो जाता है।