न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
अनुवाद
वास्तव में, भले ही हमें इस पृथ्वी पर एक शत्रुरहित, समृद्ध राज्य और यहाँ तक कि देवताओं पर सम्प्रभुता भी प्राप्त हो जाए, मैं ऐसा कुछ भी नहीं देख रहा हूँ जो इन्द्रियों को पीड़ित करने वाले इस शोक को दूर कर सके ।
भगवद्गीता के श्लोक २.८ के अनुसार, अर्जुन जब कहता है कि पृथ्वी का निष्कंटक समृद्ध राज्य या देवताओं का स्वामित्व प्राप्त होने पर भी उसकी इंद्रियों को सुखाने वाला शोक दूर नहीं हो सकता, तो व्याख्यान में इसके पीछे क्या गहरा दार्शनिक कारण बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार राज्य मिलने पर चिंता बढ़ने का तर्क मुख्य कारण नहीं है, बल्कि मुख्य दार्शनिक सत्य यह है कि बाह्य वस्तुएँ आंतरिक अविद्या को नष्ट नहीं कर सकतीं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि शोक एक आंतरिक पीड़ा है जिसका कारण अविद्या (अपने वास्तविक स्वरूप को न जानना) और आसक्ति है। जिस प्रकार शरीर के आंतरिक बुखार या रोग को केवल नौका-विहार या सुंदर दृश्य दिखाने से ठीक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार बाह्य राज्य या भौतिक संपदा से अविद्या और शोक दूर नहीं हो सकते; इसके लिए आत्म-ज्ञान आवश्यक है।
श्लोक २.९ और २.१० में अर्जुन द्वारा एक तरफ "मैं आपका शरणागत शिष्य हूँ" कहना और दूसरी तरफ "मैं युद्ध नहीं करूँगा" कहकर चुप हो जाने पर भगवान श्री कृष्ण के मुस्कुराने ('प्रहसन्निव') का क्या सूक्ष्म रहस्य और साधक की दुर्बलता उजागर होती है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन का युद्ध न करने का निर्णय ज्ञान का प्रतीक नहीं, बल्कि मोह और शोक से ग्रस्त क्षणिक दुर्बलता थी; इसीलिए भगवान उसकी इस परस्पर विरोधी बात पर हँसते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि एक तरफ अर्जुन 'शाधि मां प्रपन्नम्' (मुझे शिक्षा दीजिए, मैं शरणागत हूँ) कहता है और दूसरी तरफ 'न योत्स्ये' (मैं युद्ध नहीं करूँगा) का अपना अंतिम निर्णय सुना देता है। यह साधक की इस दुर्बलता को प्रकट करता है कि वह अपने अहंकार को सुरक्षित रखते हुए चाहता है कि गुरु वही आदेश दें जो वह स्वयं करना चाहता है।