भ. गी. 2.71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

अनुवाद

जो व्यक्ति समस्त इच्छाओं को त्यागकर, लालसा से रहित होकर तथा ’मैं’ और ’मेरा’ की धारणाओं से मुक्त होकर जीवन जीता है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक २.७० ("आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्...") की व्याख्या में 'समुद्र' और 'नदियों' के दृष्टांत द्वारा शांत और अशांत व्यक्ति के बीच क्या दार्शनिक अंतर समझाया गया है?

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