भ. गी. 2.71
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥
अनुवाद
जो व्यक्ति समस्त इच्छाओं को त्यागकर, लालसा से रहित होकर तथा ’मैं’ और ’मेरा’ की धारणाओं से मुक्त होकर जीवन जीता है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है ।
जो व्यक्ति समस्त इच्छाओं को त्यागकर, लालसा से रहित होकर तथा ’मैं’ और ’मेरा’ की धारणाओं से मुक्त होकर जीवन जीता है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार समुद्र का जल-स्तर नदियों के आने से उफनता नहीं है और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति विषयों के पीछे नहीं दौड़ता।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि समुद्र इतना विशाल है कि उसमें नदियों का जल समाने पर भी वह मर्यादा नहीं लांघता और न ही नदियों के पीछे दौड़ता है। उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के पास प्रारब्ध-वश विषय आते हैं पर वे उसकी बुद्धि को विचलित नहीं करते। इसके विपरीत, 'कामकामी' (विषयों की कामना करने वाला) कभी शांत नहीं रह सकता।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अहंकार सबसे सूक्ष्म (आंतरिक) है, उससे ममता पैदा होती है, फिर स्पृहा और सबसे स्थूल कामना है। श्लोक २.७२ में 'एषा ब्राह्मी स्थितिः' को जीवन-मुक्त अवस्था कहा गया है। यदि यह स्थिति अंतकाल में भी प्राप्त हो जाए (जैसे राजा खटवांग को देवताओं से आयु का ज्ञान होने पर अंतिम क्षणों में प्रभु-चिंतन से मिली थी), तो व्यक्ति को ब्रह्म-निर्वाण प्राप्त होता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अहंकार सबसे सूक्ष्म है। इसके अतिरिक्त श्लोक में 'स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि' कहकर स्पष्ट किया गया है कि अंतकाल में भी यह स्थिति मिलने पर मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।