हे पार्थ ! यह ईश्वर-साक्षात्कार की अवस्था है । इसे प्राप्त करके व्यक्ति कभी मोहग्रस्त नहीं होता है । इस अवस्था में स्थित होकर, मृत्यु के समय भी व्यक्ति ब्रह्म में मोक्ष प्राप्त कर लेता है [अर्थात् परब्रह्म* के संग में बन्धनरहित होकर रहता है]।
टिप्पणियाँ
* परब्रह्म शब्द का शाब्दिक अर्थ “परम ब्रह्म” अथवा “परम निरपेक्ष सत्य” है। आस्तिक वेदान्त में इसका प्रयोग मुख्यतः सविशेष परम सत्य (भगवान्) के लिए किया जाता है, जो निर्विशेष परम सत्य (ब्रह्म) से भिन्न है। ब्रह्म, परब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये सभी पद एक ही सत्य को व्यक्त करते हैं। इसलिए जब इनका प्रयोग सामान्य अर्थ में उस सत्य के लिए किया जाता है, तब ये परस्पर विनिमेय होते हैं; इस श्लोक में ब्रह्म शब्द का प्रयोग इसी प्रकार हुआ है। किंतु पारिभाषिक अर्थ में ब्रह्म का प्रयोग विशेष रूप से निर्विशेष परम सत्य के लिए होता है, जैसा कि अद्वैत-वेदान्त में है। यदि इसी प्रकार अर्थ किया जाए, तो इस श्लोक में आए ब्रह्म-निर्वाण का अर्थ ब्रह्म-लय, अर्थात् आत्मा का ब्रह्म में विलय, माना जा सकता है—जैसा श्रीधर स्वामी ने किया है। किंतु ऐसा अर्थ उस सामान्य संदर्भ को अनावश्यक रूप से विशिष्ट बना देता है। इसके अतिरिक्त, यह गीता के समग्र विषय के अनुरूप नहीं है, जिसकी प्रकृति स्पष्टतः ईश्वरवादी है। इसलिए यहाँ ब्रह्म को परब्रह्म—व्यक्तित्वयुक्त परम सत्य, भगवान्—और ब्रह्म-निर्वाण को उनके सान्निध्य में प्राप्त मुक्त अवस्था के रूप में समझना चाहिए।
भगवद्गीता के श्लोक २.७० ("आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्...") की व्याख्या में 'समुद्र' और 'नदियों' के दृष्टांत द्वारा शांत और अशांत व्यक्ति के बीच क्या दार्शनिक अंतर समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार समुद्र का जल-स्तर नदियों के आने से उफनता नहीं है और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति विषयों के पीछे नहीं दौड़ता।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि समुद्र इतना विशाल है कि उसमें नदियों का जल समाने पर भी वह मर्यादा नहीं लांघता और न ही नदियों के पीछे दौड़ता है। उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के पास प्रारब्ध-वश विषय आते हैं पर वे उसकी बुद्धि को विचलित नहीं करते। इसके विपरीत, 'कामकामी' (विषयों की कामना करने वाला) कभी शांत नहीं रह सकता।
भगवद्गीता के श्लोक २.७१ व २.७२ की व्याख्या के अनुसार, परम शांति हेतु त्याग की जाने वाली चार वस्तुओं (कामना, स्पृहा, ममता, अहंकार) का सूक्ष्मता का क्रम क्या है, तथा 'ब्राह्मी स्थिति' और 'खटवांग राजा' के दृष्टांत से क्या मुख्य निष्कर्ष निकलता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अहंकार सबसे सूक्ष्म (आंतरिक) है, उससे ममता पैदा होती है, फिर स्पृहा और सबसे स्थूल कामना है। श्लोक २.७२ में 'एषा ब्राह्मी स्थितिः' को जीवन-मुक्त अवस्था कहा गया है। यदि यह स्थिति अंतकाल में भी प्राप्त हो जाए (जैसे राजा खटवांग को देवताओं से आयु का ज्ञान होने पर अंतिम क्षणों में प्रभु-चिंतन से मिली थी), तो व्यक्ति को ब्रह्म-निर्वाण प्राप्त होता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अहंकार सबसे सूक्ष्म है। इसके अतिरिक्त श्लोक में 'स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि' कहकर स्पष्ट किया गया है कि अंतकाल में भी यह स्थिति मिलने पर मोक्ष प्राप्त हो जाता है।