भ. गी. 2.9
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥
अनुवाद
सञ्जय ने कहा – हृषिकेश से इस प्रकार कहने के पश्चात्, शत्रुओं को ताप देने वाले गुडाकेश ने गोविन्द से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और चुप हो गये ।
सञ्जय ने कहा – हृषिकेश से इस प्रकार कहने के पश्चात्, शत्रुओं को ताप देने वाले गुडाकेश ने गोविन्द से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और चुप हो गये ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार राज्य मिलने पर चिंता बढ़ने का तर्क मुख्य कारण नहीं है, बल्कि मुख्य दार्शनिक सत्य यह है कि बाह्य वस्तुएँ आंतरिक अविद्या को नष्ट नहीं कर सकतीं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि शोक एक आंतरिक पीड़ा है जिसका कारण अविद्या (अपने वास्तविक स्वरूप को न जानना) और आसक्ति है। जिस प्रकार शरीर के आंतरिक बुखार या रोग को केवल नौका-विहार या सुंदर दृश्य दिखाने से ठीक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार बाह्य राज्य या भौतिक संपदा से अविद्या और शोक दूर नहीं हो सकते; इसके लिए आत्म-ज्ञान आवश्यक है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन का युद्ध न करने का निर्णय ज्ञान का प्रतीक नहीं, बल्कि मोह और शोक से ग्रस्त क्षणिक दुर्बलता थी; इसीलिए भगवान उसकी इस परस्पर विरोधी बात पर हँसते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि एक तरफ अर्जुन 'शाधि मां प्रपन्नम्' (मुझे शिक्षा दीजिए, मैं शरणागत हूँ) कहता है और दूसरी तरफ 'न योत्स्ये' (मैं युद्ध नहीं करूँगा) का अपना अंतिम निर्णय सुना देता है। यह साधक की इस दुर्बलता को प्रकट करता है कि वह अपने अहंकार को सुरक्षित रखते हुए चाहता है कि गुरु वही आदेश दें जो वह स्वयं करना चाहता है।
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