भगवान् विष्णु को अर्पित होने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म इस संसार में बन्धन का कारण हैं । अतएव हे कौन्तेय (अर्जुन), तुम (कर्म के) फलों में अनासक्त रहते हुए केवल भगवान् विष्णु के लिए कुशलतापूर्वक अपने कर्म करो।
भगवद्गीता के श्लोक ३.९ ("यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः...") की व्याख्या के अनुसार, 'यज' धातु के कौन से तीन अर्थ बताए गए हैं, तथा कर्म मनुष्य को किस प्रकार बांधता है (तीन प्रकार की आसक्तियाँ)?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'यज' धातु के तीन अर्थ हैं—देव-पूजा, संगतीकरण और दान। कर्म स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसके साथ जुड़ी तीन आसक्तियाँ—कर्तृत्व (मैं कर्ता हूँ), कर्म की आसक्ति और फल की आसक्ति ही मनुष्य को कर्म-बंधन में डालती हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार यज्ञ का क्षेत्र केवल अग्निहोत्र तक सीमित नहीं है। साथ ही, कर्तृत्व, कर्म और फल—तीनों में से एक भी आसक्ति हो तो वह व्यक्ति को कर्म से बाँध देती है।
व्याख्यान के अनुसार, आधुनिक विज्ञान और भारतीय वैदिक संस्कृति में प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण का क्या मूलभूत अंतर दर्शाया गया है, तथा वास्तविक 'आंतरिक यज्ञ' (अहंकार की आहुति) का क्या स्वरूप समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि आधुनिक विज्ञान प्रकृति को जड़ वस्तु मानकर केवल तात्कालिक लाभ के लिए शोषण करता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग व प्रदूषण जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं। वैदिक संस्कृति प्रकृति को चेतन/देवता मानकर 'लेना और देना' (यज्ञ चक्र) सिखाती है। इसके अतिरिक्त, बाह्य यज्ञों का वास्तविक और अंतिम उद्देश्य अपने 'अहंकार' व 'कर्तृत्व' को भगवान के चरणों में समर्पित (आहुत) करना है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में आधुनिक बाजारवादी दृष्टि को प्रकृति का शोषण करने वाला और वैदिक संस्कृति को वसुधैव कुटुम्बकम् तथा प्रकृति-पूजक बताया गया है।