भ. गी. 3.17
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
अनुवाद
परन्तु जो व्यक्ति केवल आत्मा में ही रमण करता है, जो आत्मतृप्त है तथा आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके कोई कर्तव्य नहीं होते हैं ।
परन्तु जो व्यक्ति केवल आत्मा में ही रमण करता है, जो आत्मतृप्त है तथा आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके कोई कर्तव्य नहीं होते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि आत्मज्ञानी पुरुष निष्क्रिय नहीं बैठता, क्योंकि कोई भी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। वह केवल अपने स्वार्थ के लिए कर्म नहीं करता, बल्कि भगवान और संसार की सेवा के लिए कर्म करता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि शास्त्रों के समस्त विधि-निषेधों और नियमों का उद्देश्य साधक को भगवत्प्राप्ति व आत्म-साक्षात्कार तक पहुँचाना है । जब कोई साधक भगवान की शरण में पहुँचकर आत्मा/परमात्मा में ही तृप्त और संतुष्ट हो जाता है, तो उस पर शास्त्र के बाध्यकारी नियम लागू नहीं रहते। वह आलसी नहीं बनता, बल्कि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के बिना निष्काम भाव से भगवद्-सेवा व परोपकार के लिए कर्म करता रहता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या श्लोक के वास्तविक दार्शनिक भाव के विपरीत है; आत्मज्ञानी पुरुष किसी भौतिक लाभ के लिए कर्म नहीं करता और न ही वह मुक्ति या उद्देश्य-पूर्ति के लिए संसार के जीवों पर आश्रित होता है ।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर चुका है। अतः कर्म करने से उसे कोई व्यक्तिगत फल ('कृतेन') नहीं पाना है और न ही कर्म छूटने से कोई पाप या हानि ('अकृतेन') होती है । इसके अलावा, चूँकि उसे अपने अंदर कोई अभाव या कमी महसूस नहीं होती, इसलिए अपने किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए उसे किसी प्राणी पर आश्रित ('व्यपाश्रय') नहीं होना पड़ता ।
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