भ. गी. 3.18

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥

अनुवाद

इस संसार में ऐसे आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति को न तो अपने निर्धारित कर्म के निर्वाह से कुछ लाभ प्राप्त करना है, न ही कर्मनिर्वाह न करने से उसे कुछ हानि होती है, और न ही वह किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी पर आश्रित होता है।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.१७ ("यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः...") की व्याख्या में 'आत्मरति', 'आत्मतृप्त' और 'आत्मसंतुष्ट' अवस्था वाले ज्ञानी/भक्त पुरुष के लिए 'तस्य कार्यं न विद्यते' (उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता) का क्या शास्त्रीय रहस्य बताया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।