भ. गी. 3.19
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
अनुवाद
अतः सदैव फल की आसक्ति से रहित होकर अपने नियत कर्म को कुशलतापूर्वक करते रहो । आसक्ति रहित होकर अपने नियत कर्म को करने से मनुष्य निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करता है ।
अतः सदैव फल की आसक्ति से रहित होकर अपने नियत कर्म को कुशलतापूर्वक करते रहो । आसक्ति रहित होकर अपने नियत कर्म को करने से मनुष्य निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'सतत' शब्द का मुख्य अन्वय 'असक्त' के साथ है। किसी बीमारी के कारण भोजन से रुचि हट जाना या क्रोध में किसी से मन उचट जाना क्षणिक होता है और स्थिति बदलते ही पुनः जाग जाता है। वास्तविक आसक्ति-मुक्ति का अर्थ कामना के सूक्ष्म बीज से रहित होकर निरंतर असक्त रहना है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल बिना सोचे-समझे कार्य करते रहना श्रेयस्कर नहीं है, बल्कि आसक्ति से रहित होना मुख्य सिद्धांत है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि बिना राग-द्वेष के बने उदासीन संस्कार बलहीन होते हैं और मनुष्य को बाँधते नहीं हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि सड़क पर चलते हुए दुकानें या राहगीरों को देखने से भी संस्कार पड़ते हैं, पर राग-द्वेष न होने से वे उदासीन संस्कार होते हैं। संस्कारों को सक्रिय व भारी बनाने का काम राग और द्वेष करते हैं। अतः आसक्ति-रहित कर्म करने से राग-द्वेष न होने के कारण कर्म मोक्ष का साधन बनता है, बंधन का नहीं।
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