भ. गी. 3.19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

अनुवाद

अतः सदैव फल की आसक्ति से रहित होकर अपने नियत कर्म को कुशलतापूर्वक करते रहो । आसक्ति रहित होकर अपने नियत कर्म को करने से मनुष्य निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, 'तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर' श्लोक में 'सतत' शब्द का वास्तविक अन्वय किसके साथ है, तथा क्षणिक आसक्ति-हीनता और निरंतर आसक्ति-रहित होने में क्या मूलभूत भेद समझाया गया है?

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