भ. गी. 3.20

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥

अनुवाद

निःसंदेह, केवल निष्काम कर्म से ही जनक* आदि ने सिद्धि प्राप्त की थी । जनसाधारण की शिक्षा के लिए आदर्श को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन अवश्य करना चाहिए ।

टिप्पणियाँ

* मिथिला के राजा जनक, सीता देवी के पिता और भगवान् श्रीराम के श्वसुर थे। वे शास्त्रीय ज्ञान में पारंगत और पूर्णतः अनासक्त थे। अपने सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करके उन्होंने आध्यात्मिक धाम प्राप्त किया।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के बीसवें श्लोक ("कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः...") की व्याख्या के अनुसार, राजा जनक का क्या ऐतिहासिक व आध्यात्मिक परिचय दिया गया है, तथा 'लोकसंग्रह' का वास्तविक शास्त्रीय अर्थ क्या समझाया गया है?

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