कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
अनुवाद
निःसंदेह, केवल निष्काम कर्म से ही जनक* आदि ने सिद्धि प्राप्त की थी । जनसाधारण की शिक्षा के लिए आदर्श को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन अवश्य करना चाहिए ।
टिप्पणियाँ
* मिथिला के राजा जनक, सीता देवी के पिता और भगवान् श्रीराम के श्वसुर थे। वे शास्त्रीय ज्ञान में पारंगत और पूर्णतः अनासक्त थे। अपने सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करके उन्होंने आध्यात्मिक धाम प्राप्त किया।
भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के बीसवें श्लोक ("कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः...") की व्याख्या के अनुसार, राजा जनक का क्या ऐतिहासिक व आध्यात्मिक परिचय दिया गया है, तथा 'लोकसंग्रह' का वास्तविक शास्त्रीय अर्थ क्या समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार राजा जनक कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे, बल्कि महान ज्ञानी थे जिनसे सुखदेव गोस्वामी ने भी अध्ययन किया था। इसके अलावा 'लोकसंग्रह' का अर्थ व्यक्तिगत स्वार्थ या राजनीति के लिए भीड़ जमा करना नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि जनक महाराज अत्यंत बड़े ज्ञानी थे, जिनकी सभा में अष्टावक्र और याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि जाते थे तथा सुखदेव जी ने भी उनसे ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने राजा रहते हुए निष्काम कर्म से परम सिद्धि प्राप्त की। 'लोकसंग्रह' का तात्पर्य अपने आचरण से समाज को धर्म और कल्याण के मार्ग पर स्थिर रखना है।
भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के इक्कीसवें श्लोक ("यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः...") की व्याख्या के अनुसार, 'आचरण' (व्यवहार) और 'प्रमाण' (वचन) में क्या अंतर है, तथा केवल उपदेश देने वाले और आचरण करने वाले की तुलना के लिए कौन सा दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में आचरण को कर्म व व्यवहार तथा प्रमाण को शास्त्र-वचन बताया गया है, एवं आचरणयुक्त उपदेश देने वाले को असली बंदूक की उपमा दी गई है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'आचरण' व्यक्ति स्वयं अपने कर्मों से करता है और 'प्रमाण' वह वाणी से शास्त्र-वचनों द्वारा प्रस्तुत करता है। स्वामी रामसुखदास जी के दृष्टांत के अनुसार, जो केवल प्रवचन करता है पर आचरण नहीं करता, वह खिलौना बंदूक की तरह है जो केवल आवाज करती है; परंतु जो आचरण के साथ उपदेश देता है, वह असली बंदूक की तरह गहरा प्रभाव डालता है।