भ. गी. 3.22

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥

अनुवाद

हे अर्जुन ! मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है क्योंकि तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त न हुई हो और न ऐसी कोई वस्तु है जो भविष्य में प्राप्त करनी हो । फिर भी मैं क्रियाशील रहता हूँ ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.२१ ("यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः...") की व्याख्या के अनुसार, 'श्रेष्ठ' शब्द की व्युत्पत्ति तथा शास्त्र का वास्तविक सार क्या समझाया गया है?

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