न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
अनुवाद
हे अर्जुन ! मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है क्योंकि तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त न हुई हो और न ऐसी कोई वस्तु है जो भविष्य में प्राप्त करनी हो । फिर भी मैं क्रियाशील रहता हूँ ।
भगवद्गीता के श्लोक ३.२१ ("यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः...") की व्याख्या के अनुसार, 'श्रेष्ठ' शब्द की व्युत्पत्ति तथा शास्त्र का वास्तविक सार क्या समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि केवल धन या पद से कोई श्रेष्ठ नहीं बनता और बिना आचरण के केवल प्रचार करना शास्त्र का सार नहीं है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार 'श्रेष्ठ' शब्द 'प्रशस्य' (जिसके चरित्र और गुणों की स्वतः प्रशंसा करने की इच्छा हो) से बनता है। इसके साथ ही वक्ता स्पष्ट करते हैं कि शास्त्र का मूल सार केवल 'प्रचार' नहीं बल्कि 'आचार' (आचरण) है। प्रचार करने से पहले शास्त्र का अध्ययन करना और उस पर स्वयं आचरण करना अनिवार्य है।
भगवद्गीता के श्लोक ३.२२ ("न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन...") में भगवान श्री कृष्ण द्वारा स्वयं निष्काम कर्म में संलग्न रहने का क्या मूल कारण और दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार भगवान के लिए तीनों लोकों में कुछ भी अप्राप्त नहीं है और न ही वे किसी स्वार्थ के लिए कर्म करते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि भगवान आप्तकाम हैं, उन्हें किसी वस्तु की कामना नहीं है। वे केवल परोपकार, साधुओं की रक्षा और लोकसंग्रह के लिए स्वयं निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण महाभारत युद्ध के मैदान में त्रिलोकीनाथ होकर भी अर्जुन के रथ के सारथी का दायित्व निभाना है।