प्रकृति के गुणों से मोहित होकर मनुष्य इन्द्रियों और उनके कार्यों में आसक्त हो जाते हैं । यथार्थ ज्ञान वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह उन लोगों के मन को विचलित न करे जो अज्ञानी हैं और जिनकी बुद्धि जागृत नहीं है ।
भगवद्गीता के श्लोक ३.२९ ("प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु...") की व्याख्या के अनुसार, अज्ञानी जीवों के देहाध्यास (शरीर-भाव) को केवल "तुम आत्मा हो, शरीर नहीं" कहने से दूर न हो पाने के संदर्भ में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा कौन सा दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल बार-बार "तुम शरीर नहीं आत्मा हो" कहने से देहाध्यास नहीं छूटता, क्योंकि अज्ञानता और देह-आसक्ति बहुत गहरी होती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के दृष्टांत से समझाते हैं कि जिस प्रकार भूताविष्ट व्यक्ति को केवल रामदास कहने से उसका भूत नहीं उतरता, उसी प्रकार केवल मौखिक उपदेश से अज्ञान नहीं मिटता। इसलिए ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानी जन को विचलित किए बिना विहित कर्मों में लगाए ताकि उनका आसक्ति रूपी ज्वर धीरे-धीरे उतर सके।
भगवद्गीता के श्लोक ३.३० ("मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा...") की व्याख्या के अनुसार, 'अध्यात्मचेतसा' और 'विगतज्वरः' का क्या वास्तविक तात्पर्य है, तथा अर्जुन को चढ़े 'ज्वर' (बुखार) का क्या स्वरूप बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'अध्यात्मचेतसा' का अर्थ परमात्मा पर केंद्रित बुद्धि से यह स्वीकार करना है कि सब कुछ ईश्वर का ही है। अर्जुन को कोई शारीरिक या जीवाणुजन्य बुखार नहीं था, बल्कि आसक्ति का मानस-ज्वर चढ़ गया था जिससे उसका शरीर काँपने लगा और धनुष हाथ से गिर गया। भगवान उसी आसक्ति-रूपी ज्वर को त्यागकर निष्काम भाव से कर्तव्य-कर्म करने की प्रेरणा देते हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'विगतज्वरः' का तात्पर्य किसी शारीरिक औषधि या एस्पिरिन लेने से नहीं है, बल्कि आसक्ति व मोह रूपी मानसिक ज्वर से मुक्त होने से है।