भ. गी. 3.30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥

अनुवाद

अतः तुम अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पण करके, अपने मन को आत्मा में स्थिर करके, फल की इच्छा से रहित होकर, स्वामित्व की समस्त धारणाओं से मुक्त होकर तथा समस्त मानसिक सन्तापों को त्यागकर युद्ध में लग जाओ ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.२९ ("प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु...") की व्याख्या के अनुसार, अज्ञानी जीवों के देहाध्यास (शरीर-भाव) को केवल "तुम आत्मा हो, शरीर नहीं" कहने से दूर न हो पाने के संदर्भ में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा कौन सा दृष्टांत दिया गया है?

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