भ. गी. 3.31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥

अनुवाद

जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्यारहित होकर मेरे इस उपदेश का निरन्तर पालन करते हैं, वे भी निश्चय ही कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के इस उपदेश में 'मानवाः' शब्द के प्रयोग का क्या विशेष महत्व बताया गया है, तथा 'नित्यम् अनुतिष्ठन्ति' का क्या सार्वभौमिक अर्थ समझाया गया है?

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