भ. गी. 3.31
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
अनुवाद
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्यारहित होकर मेरे इस उपदेश का निरन्तर पालन करते हैं, वे भी निश्चय ही कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्यारहित होकर मेरे इस उपदेश का निरन्तर पालन करते हैं, वे भी निश्चय ही कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार यह उपदेश केवल संन्यासियों के लिए नहीं है, और न ही 'नित्यम्' का अर्थ केवल विशेष तिथियों तक सीमित पूजा-पाठ है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि पूर्व मीमांसा में अलग-अलग वैदिक यज्ञों का अधिकार अलग-अलग वर्गों (जैसे राजसूय केवल क्षत्रिय के लिए तथा बृहस्पतिसव केवल ब्राह्मण के लिए) तक सीमित था, परंतु भगवान ने 'मानवाः' शब्द का प्रयोग करके यह उपदेश समस्त मनुष्यों के लिए समान रूप से सुलभ कराया है। इसके साथ ही 'नित्यम्' का तात्पर्य किसी विशेष स्थान या काल तक सीमित न होकर प्रत्येक स्वाभाविक क्रिया को निरंतर भगवान को अर्पित करना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अश्रद्धा से किया गया कोई भी कर्म 'असत' कहलाता है और अनसूया जी ने त्रिदेवों पर कोई क्रोध या शाप नहीं दिया था।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अपि' शब्द भाव व श्रद्धा की प्रधानता को दर्शाता है कि यदि शारीरिक अशक्तता के कारण अनुष्ठान न भी हो सके पर मन में श्रद्धा व अनसूया भाव हो तो भी साधक मुक्त हो जाता है]। अनसूया जी ने अतिथियों की अनुचित माँग में भी दोषारोपण न करके अपने तपोबल से उन्हें शिशु बना दिया था ।
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