भ. गी. 3.32
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
अनुवाद
परन्तु जो लोग ईर्ष्यालु हैं और मेरे इस उपदेश का पालन नहीं करते, उनके बारे में यह जान लो कि वे समस्त ज्ञान के विषय में मोहग्रस्त हैं, नष्ट होने को तत्पर है तथा विवेकबुद्धि से रहित हैं ।
परन्तु जो लोग ईर्ष्यालु हैं और मेरे इस उपदेश का पालन नहीं करते, उनके बारे में यह जान लो कि वे समस्त ज्ञान के विषय में मोहग्रस्त हैं, नष्ट होने को तत्पर है तथा विवेकबुद्धि से रहित हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में भगवान के उपदेश की अवहेलना करने वालों को परम गति प्राप्त करने वाला नहीं बल्कि मोहग्रस्त और विमूढ़ बताया गया है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जो लोग भगवान के निष्काम कर्मयोग के उपदेश में दोषारोपण करते हैं, वे वास्तविक ज्ञान से मोहित (सर्वज्ञान-विमूढ़) हैं, उनका आध्यात्मिक जीवन पथभ्रष्ट (नष्ट) हो जाता है और वे चेतनाहीन (अचेतस) होकर केवल रोबोट की तरह जीवन बिताते हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार बाह्य निग्रह से केवल बाहरी आचरण नियंत्रित होता है, आंतरिक स्वभाव और राग-द्वेष नहीं बदलते।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि मनुष्य अपने संस्कारों व स्वभाव से संचालित होता है। यदि केवल बाह्य नियमों या डर से उसे नियंत्रित किया जाए ('निग्रह'), तो बाह्य दबाव हटते ही उसका वास्तविक स्वभाव पुनः प्रकट हो जाता है। अतः बाह्य निग्रह से आंतरिक रूपांतरण नहीं होता, बल्कि अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके राग-द्वेष से असक्त होना पड़ता है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।