भ. गी. 3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

अनुवाद

जो मनुष्य बाहर से कर्मेन्द्रियों को (तथा ज्ञानेन्द्रियों को भी) संयमित करता है, परन्तु मन में इन्द्रियविषयों का स्मरण करता रहता है, उसकी बुद्धि भ्रमित है और वह मिथ्याचारी कहलाता है* ।

टिप्पणियाँ

* कर्मेन्द्रियाणि शब्द का शाब्दिक अर्थ “कर्म करने वाली इंद्रियाँ” है, किंतु यहाँ इस पद में ज्ञानेंद्रियाँ भी सम्मिलित हैं। यदि ज्ञानेंद्रियों को केवल ऊपरी तौर पर संयमित की गई इंद्रियों में शामिल न किया जाए, तो पाखंड पूर्ण नहीं हो सकता।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.५ ("न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्...") में प्रयुक्त शब्द 'जातु' का क्या दायरा बताया गया है, तथा 'फ्री विल' (Free Will) के संदर्भ में 'कार्यते ह्यवशः कर्म' का क्या दार्शनिक निष्कर्ष दिया गया है?

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