भ. गी. 3.7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

अनुवाद

परन्तु हे अर्जुन ! जो मन के द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित कर लेता है, जो कर्म के फलों में अनासक्त रहता है तथा जो कर्मेन्द्रियों (तथा ज्ञानेन्द्रियों) के द्वारा अपने नियत कर्तव्यों का पालन करता है, वह पुरुष अतिश्रेष्ठ है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.७ ("यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन...") में 'इंद्रिय दमन' और 'इंद्रिय नियमन' का क्या सूक्ष्म अंतर समझाया गया है, तथा फ्रॉयड (Sigmund Freud) के सिद्धांत की तुलना में श्रीकृष्ण के उपदेश की क्या विशिष्टता बताई गई है?

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