यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
अनुवाद
परन्तु हे अर्जुन ! जो मन के द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित कर लेता है, जो कर्म के फलों में अनासक्त रहता है तथा जो कर्मेन्द्रियों (तथा ज्ञानेन्द्रियों) के द्वारा अपने नियत कर्तव्यों का पालन करता है, वह पुरुष अतिश्रेष्ठ है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.७ ("यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन...") में 'इंद्रिय दमन' और 'इंद्रिय नियमन' का क्या सूक्ष्म अंतर समझाया गया है, तथा फ्रॉयड (Sigmund Freud) के सिद्धांत की तुलना में श्रीकृष्ण के उपदेश की क्या विशिष्टता बताई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि दमन (Suppression) में मन के भीतर भोग की वासना बनी रहती है और व्यक्ति केवल लोक-लाज या नियमों के दबाव में विषय छोड़ता है, जो अंततः बाहर निकलकर पतन कराता है। नियमन (Regulation) में साधक अपनी बुद्धि व विवेक से स्वीकार करता है कि विषय-भोग कल्याणकारी नहीं है। फ्रॉयड ने यूरोप में काम-वासना के दमन से उत्पन्न हिस्टीरिया व मानसिक रोगों को देखकर दमन रोकने को तो कहा, किंतु नियमन न जानने के कारण समाज को स्वच्छंदता की ओर धकेल दिया। भगवान कृष्ण दमन और उच्छृंखल भोग दोनों से बचाकर 'इंद्रिय नियमन' तथा निष्काम कर्मयोग का मार्ग दिखाते हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में इंद्रिय दमन को आध्यात्मिक प्रगति के लिए हानिकारक बताया गया है, न कि सर्वोच्च साधना। साथ ही, फ्रॉयड ने गीता का अध्ययन नहीं किया था और न ही भोजन-जल त्यागने की बात कही थी।
भगवद्गीता के श्लोक ३.८ ("नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः...") की व्याख्या में पूर्व मीमांसा के कर्मकांड और गीता के निष्काम कर्मयोग में क्या अंतर दर्शाया गया है, तथा "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येद्" का क्या व्यावहारिक अर्थ दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पूर्व मीमांसा दर्शन केवल शास्त्रों में अज्ञात/अप्राप्त वैदिक कर्मों (नित्य, नैमित्तिक आदि) का विधान करता है और साधारण लौकिक कर्मों की बात नहीं करता। परंतु गीता तथा भागवत पुराण में लौकिक एवं स्वभाव-प्राप्त कर्मों को भी भगवान को अर्पित करके निष्काम कर्मयोग बनाने का व्यावहारिक उपदेश है। इसके साथ ही, भगवान कहते हैं कि यदि कोई कर्म न करने (अकर्म) का ढोंग भी करे, तो भी शरीर को जीवित रखने के लिए भोजन चबाने, स्नान आदि न्यूनतम कर्म करने ही पड़ेंगे; अतः कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।
विकल्प ख (गलत): पूर्व मीमांसा कर्म त्यागने का नहीं बल्कि वैदिक कर्मकांड का विधान करती है। इसके अतिरिक्त, श्लोक का अर्थ यह नहीं है कि निष्काम कर्मयोगी को शरीर के लिए कर्म नहीं करना पड़ता, बल्कि यह है कि शरीर यात्रा के लिए भी कर्म अनिवार्य है।