भ. गी. 3.8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

अनुवाद

अतः तुम अपने कर्मों को करो, क्योंकि कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है । इसके अतिरिक्त कर्म के बिना तुम्हारा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.७ ("यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन...") में 'इंद्रिय दमन' और 'इंद्रिय नियमन' का क्या सूक्ष्म अंतर समझाया गया है, तथा फ्रॉयड (Sigmund Freud) के सिद्धांत की तुलना में श्रीकृष्ण के उपदेश की क्या विशिष्टता बताई गई है?

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