भ. गी. 4.10
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
अनुवाद
आसक्ति, भय और क्रोध से पूर्णतया मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तल्लीन होकर, मेरी शरण लेकर तथा ज्ञान और तप से शुद्ध होकर अनेक मनुष्यों ने पूर्वकाल में मुझे प्राप्त किया है ।
आसक्ति, भय और क्रोध से पूर्णतया मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तल्लीन होकर, मेरी शरण लेकर तथा ज्ञान और तप से शुद्ध होकर अनेक मनुष्यों ने पूर्वकाल में मुझे प्राप्त किया है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'वीतराग' का अर्थ द्वेष या वैर रखना नहीं है और न ही क्रोध का कारण केवल शारीरिक तापमान का बढ़ना है, बल्कि क्रोध का वास्तविक कारण अहंकार है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'वीतराग' का अर्थ विषयों से द्वेष या वैर की आग रखना नहीं है, बल्कि आसक्ति और द्वेष दोनों से रहित होना है। इसके अतिरिक्त, यदि तपस्या का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना हो और वास्तविक ज्ञान न हो, तो साधक में अपनी तपस्या का अहंकार आ जाता है। अहंकार ही क्रोध का मूल कारण है, इसीलिए अशुद्ध साधना वाले तपस्वी शीघ्र क्रोधी हो जाते हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान नास्तिकों को जबरन परेशान या आकर्षित नहीं करते बल्कि उनकी भावना का सम्मान करते हुए विमुख रहने देते हैं; तथा कंस की मल्लशाला में वे केवल एक रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग रूपों में दिखाई दिए थे।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान में कोई विषमता नहीं है; जो जिस भाव या दृष्टिकोण से उन्हें देखता है, वे उसी रूप में अनुग्रह या फल देते हैं। जैसे कंस की सभा में श्रीकृष्ण एक ही समय में विभिन्न देखने वालों की अपनी-अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग रूपों (मल्लों को पहलवान, योगियों को परम तत्व, कंस को मृत्यु आदि) में दिखाई दिए।
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