भ. गी. 4.10

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥

अनुवाद

आसक्ति, भय और क्रोध से पूर्णतया मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तल्लीन होकर, मेरी शरण लेकर तथा ज्ञान और तप से शुद्ध होकर अनेक मनुष्यों ने पूर्वकाल में मुझे प्राप्त किया है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.१० ("वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः...") की व्याख्या के अनुसार, 'वीतराग' शब्द का क्या वास्तविक दार्शनिक अर्थ बतलाया गया है, तथा केवल बाह्य तपस्या करने वाले साधकों में बहुधा 'क्रोध' उत्पन्न होने का क्या आंतरिक कारण दर्शाया गया है?

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