भ. गी. 4.9
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
अनुवाद
अर्जुन, जो मेरे जन्म और कर्मों की दिव्यता को इस प्रकार यथार्थ रूप से जान लेता है वह शरीर त्यागने के पश्चात् पुनर्जन्म नहीं लेता अपितु मुझे प्राप्त करता है ।
अर्जुन, जो मेरे जन्म और कर्मों की दिव्यता को इस प्रकार यथार्थ रूप से जान लेता है वह शरीर त्यागने के पश्चात् पुनर्जन्म नहीं लेता अपितु मुझे प्राप्त करता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान किसी के लौकिक अंगरक्षक नहीं हैं और वे हमारे कर्म-फल या शारीरिक कष्टों में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते; और न ही केवल दुष्टों को मारना उनका प्राथमिक उद्देश्य है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान अपने भक्तों के शरीर या धन-संपत्ति की लौकिक रक्षा हमेशा नहीं करते (जैसे अभिमन्यु या द्रोपदी के पुत्रों के दृष्टांत में), बल्कि उनकी मुख्य कृपा भक्तों के भाव और बुद्धि को अपने में लगाए रखना है। इसके अलावा, दुष्टों के विनाश का वास्तविक अर्थ उनकी दुष्टता का निवारण करना और हृदय परिवर्तन करना है, जिसे चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम-दान द्वारा करके दिखाया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में भगवान के शरीर को त्रिगुणात्मक या भौतिक नियमों के अधीन नहीं बल्कि सच्चिदानंद विग्रह बताया गया है, और वे अपने शरीर को कभी जलाते नहीं बल्कि अप्रकट होते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि जीव का जन्म कर्म-परवश होता है किंतु भगवान अपनी स्वरूप-शक्ति से लीलापूर्वक प्रकट होते हैं और उनके कर्म अलौकिक/दिव्य होते हैं। श्लोक में 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' में मृत्यु का उल्लेख इसलिए नहीं है क्योंकि भगवान की भौतिक मृत्यु नहीं होती; वे अपने सच्चिदानंद विग्रह के साथ ही बिना देह त्यागे अप्रकट हो जाते हैं।
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