भ. गी. 4.9

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

अनुवाद

अर्जुन, जो मेरे जन्म और कर्मों की दिव्यता को इस प्रकार यथार्थ रूप से जान लेता है वह शरीर त्यागने के पश्चात् पुनर्जन्म नहीं लेता अपितु मुझे प्राप्त करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.८ ("परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का 'मुख्य उद्देश्य' भक्तों के संदर्भ में क्या समझाया गया है, तथा 'विनाशाय च दुष्कृताम्' का क्या गहरा आध्यात्मिक अर्थ प्रकट किया गया है?

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