भ. गी. 4.17

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥

अनुवाद

मनुष्य को निर्धारित कर्म, निषिद्ध कर्म और अकर्म के सत्य का बोध होना चाहिए क्योंकि कर्म की आन्तरिक प्रक्रिया को समझ पाना कठिन है ।

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अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, 'कर्म' और 'क्रिया' में क्या मूलभूत अंतर समझाया गया है, तथा कर्म के नियम केवल मनुष्य जाति पर ही विशेष रूप से क्यों लागू होते हैं, पशु-पक्षियों पर क्यों नहीं?

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