भ. गी. 4.18
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
अनुवाद
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है वही मनुष्यों में बुद्धिमान है । ऐसा मनुष्य समचित्त होकर सभी कर्मों में भाग लेता है ।
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है वही मनुष्यों में बुद्धिमान है । ऐसा मनुष्य समचित्त होकर सभी कर्मों में भाग लेता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जब व्यक्ति फल-आसक्ति और कर्तृत्व-अभिमान छोड़कर कार्य करता है तो वह कर्म अकर्म (बंधनहीन) बन जाता है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति केवल बाहर से कर्म छोड़ दे परंतु अंतःकरण में कामनाएँ व कर्तृत्व का भाव बनाए रखे या देह-निर्वाह के ऋण चुकाए बिना बैठा रहे, तो वह निष्क्रियता भी वास्तव में कर्म के बंधन में ही फँसाती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में कर्म छोड़ने को अकर्म नहीं कहा गया है, और न ही निष्काम साधना को व्यर्थ कर्मकांड बतलाया गया है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि मन जब किसी वस्तु को 'उत्तम या सुखदायी' मान लेता है तो वही संकल्प कामना को जन्म देता है। इसके अलावा, जैसे छिलके रहित या भुंजे हुए धान/चावल से नया अंकुर नहीं जमता परंतु वह आहार के रूप में पोषण करता है, उसी प्रकार काम-संकल्प से रहित कर्म ज्ञान-अग्नि में दग्ध होकर जीव का निर्वाह तो करते हैं पर नया कर्म-बंधन निर्मित नहीं करते।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में संकल्प को सम्यक कल्पना (कामना का मूल) बतलाया गया है, और ज्ञानाग्नि में कर्म-बीज दग्ध होते हैं, न कि साधक का भौतिक शरीर।
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