भ. गी. 4.6

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥

अनुवाद

यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, मेरा दिव्य शरीर अव्यय है, और यद्यपि मैं सभी प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी ही प्रकृति (स्वरूप) में स्थित होकर, मैं अपनी आत्ममाया से (इस संसार में) प्रकट होता हूँ ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.५ की व्याख्या के अनुसार, जीवात्मा और भगवान श्रीकृष्ण—दोनों के नित्य होने पर भी—उनकी स्मृति में पाए जाने वाले मूलभूत अंतर का मुख्य दार्शनिक कारण क्या समझाया गया है, तथा पूर्व जन्मों की विस्मृति (भूल जाना) को जीव के लिए किस प्रकार हितकारी माना गया है?

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