भ. गी. 4.7
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अनुवाद
हे भारत, जब-जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।
हे भारत, जब-जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'धर्म' शब्द 'धृ' (धारण करना/स्थिति बनाकर रखना) से बना है। वस्तुओं का धर्म (जैसे अग्नि का जलाना) स्वभाव से होता है, परंतु समाज का धर्म यातायात के नियमों की भाँति मनुष्य द्वारा धारण और पालन किया जाता है ताकि विभिन्न व्यक्तियों की टकराती हुई इच्छाओं के बीच संतुलन बना रहे और समाज सुरक्षित रहे।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'धृ' का अर्थ दूसरों को अधीन करना नहीं है, और न ही यातायात के नियम वस्तुओं के स्वाभाविक गुण की तरह स्वतः घटित होते हैं, बल्कि उन्हें विवेकपूर्वक नियमों के रूप में अपनाना पड़ता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि धर्म की ग्लानि (हानि) नियमों के नष्ट होने से नहीं, बल्कि मनुष्य के राग और द्वेष के कारण होती है, जिससे वह अपनी आवश्यकता से अधिक संग्रह करने या दूसरों का अधिकार छीनने का प्रयास करता है। पिप्पलाद मुनि की पत्नी का दृष्टांत यही सिद्ध करता है कि काम के आते ही धर्म का क्षय आरंभ हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि धर्म का क्षय किसी बाहरी धन की कमी से नहीं, बल्कि आंतरिक राग-द्वेष और काम-वासना के कारण होता है।
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