भ. गी. 4.7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

अनुवाद

हे भारत, जब-जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।

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अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, 'धर्म' शब्द की 'धृ' धातु से व्युत्पत्ति तथा यातायात के नियमों के दृष्टांत से धर्म का क्या वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य समझाया गया है?

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