भगवद्गीता के श्लोक ४.८ ("परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का 'मुख्य उद्देश्य' भक्तों के संदर्भ में क्या समझाया गया है, तथा 'विनाशाय च दुष्कृताम्' का क्या गहरा आध्यात्मिक अर्थ प्रकट किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान किसी के लौकिक अंगरक्षक नहीं हैं और वे हमारे कर्म-फल या शारीरिक कष्टों में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते; और न ही केवल दुष्टों को मारना उनका प्राथमिक उद्देश्य है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान अपने भक्तों के शरीर या धन-संपत्ति की लौकिक रक्षा हमेशा नहीं करते (जैसे अभिमन्यु या द्रोपदी के पुत्रों के दृष्टांत में), बल्कि उनकी मुख्य कृपा भक्तों के भाव और बुद्धि को अपने में लगाए रखना है। इसके अलावा, दुष्टों के विनाश का वास्तविक अर्थ उनकी दुष्टता का निवारण करना और हृदय परिवर्तन करना है, जिसे चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम-दान द्वारा करके दिखाया।
भगवद्गीता के श्लोक ४.९ ("जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वतः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य और कर्मों को 'दिव्य' कहने का क्या तात्विक कारण बतलाया गया है, तथा इस श्लोक में 'मृत्यु' शब्द का उल्लेख न होने का क्या रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में भगवान के शरीर को त्रिगुणात्मक या भौतिक नियमों के अधीन नहीं बल्कि सच्चिदानंद विग्रह बताया गया है, और वे अपने शरीर को कभी जलाते नहीं बल्कि अप्रकट होते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि जीव का जन्म कर्म-परवश होता है किंतु भगवान अपनी स्वरूप-शक्ति से लीलापूर्वक प्रकट होते हैं और उनके कर्म अलौकिक/दिव्य होते हैं। श्लोक में 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' में मृत्यु का उल्लेख इसलिए नहीं है क्योंकि भगवान की भौतिक मृत्यु नहीं होती; वे अपने सच्चिदानंद विग्रह के साथ ही बिना देह त्यागे अप्रकट हो जाते हैं।