भ. गी. 4.8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अनुवाद

मैं प्रत्येक युग** में साधुओं की रक्षा और दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए तथा धर्म की स्थापना हेतु प्रकट होता हूँ ।

टिप्पणियाँ

* संस्कृत में किसी संज्ञा की पुनरावृत्ति उस संज्ञा के सार्वत्रिक वितरण को व्यक्त करती है और “प्रत्येक” का भाव देती है।

** वैदिक संस्कृति में काल चक्रीय है और उसे व्यापक रूप से सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युगों में विभाजित किया गया है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.८ ("परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का 'मुख्य उद्देश्य' भक्तों के संदर्भ में क्या समझाया गया है, तथा 'विनाशाय च दुष्कृताम्' का क्या गहरा आध्यात्मिक अर्थ प्रकट किया गया है?

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