भ. गी. 5.12

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥

अनुवाद

कर्मफल का त्याग करके निष्काम कर्म से युक्त व्यक्ति शाश्वत शान्ति प्राप्त करता है । परन्तु स्वार्थ से कर्म करने वाला व्यक्ति, कामना से प्रेरित होने के कारण फल में आसक्त होकर बन्धन में ही पड़ा रहता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.११ ("कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि...") की व्याख्या के अनुसार, 'आत्मशुद्धये' (आत्म-शुद्धि के लिए) पद में 'आत्मा' का क्या अर्थ समझाया गया है, तथा 'केवलैः' शब्द का वास्तविक आध्यात्मिक अभिप्राय क्या बतलाया गया है?

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