मन से सभी कर्मों का त्याग करके, शरीर एवं मन को वश में करके, वह देहधारी आत्मा नौ द्वारों वाले नगर* में सुखपूर्वक निवास करता है । वह न तो कर्म करता है और न ही कर्म करवाता है ।
टिप्पणियाँ
* “नगर” से आशय शरीर है। “नौ द्वार” शरीर के नौ छिद्रों को सूचित करते हैं। ये हैं—प्रजनन के लिए जननेंद्रिय, मल-त्याग के लिए गुदा, देखने के लिए नेत्र, सुनने के लिए कान, श्वास लेने के लिए नासिका-छिद्र तथा ग्रहण करने और बोलने के लिए मुख।
भगवद्गीता के श्लोक ५.१३ ("सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी...") की व्याख्या के अनुसार, 'कैटालिस्ट' (उत्प्रेरक) के दृष्टांत द्वारा आत्मा की निष्क्रियता को कैसे समझाया गया है, तथा शास्त्र में बताए गए कर्ता के तीन प्रकारों के संदर्भ में आत्मा की वास्तविक स्थिति क्या बतलाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि रसायन विज्ञान में कैटालिस्ट की उपस्थिति क्रिया के लिए आवश्यक होती है, किंतु वह स्वयं क्रिया में परिणामित नहीं होता। उसी प्रकार आत्मा की स्थिति से शरीर में क्रियाएँ होती हैं, परंतु आत्मा स्वयं अकर्ता रहती है। इसके अलावा, कर्ता तीन प्रकार के होते हैं—स्वतंत्र (स्वयं करने वाला), प्रयोजक (दूसरों से कराने वाला), और प्रयोज्य (अधीन होकर करने वाला)। आत्मा इनमें से कोई भी नहीं है क्योंकि वह न करती है और न ही करवाती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आत्मा की चेतनता कैटालिस्ट की तरह खर्च नहीं होती, और न ही आत्मा 'प्रयोजक कर्ता' के रूप में शरीर से कार्य करवाती है।
भगवद्गीता के श्लोक ५.१४ ("न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः...") की व्याख्या के अनुसार, श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार 'स्वभावस्तु प्रवर्तते' में 'स्वभाव' का क्या तात्विक अर्थ है, तथा भगवान द्वारा जीवों को कर्म-फल देने की प्रक्रिया को बैंक/वेतन (पेरोल) व्यवस्था के दृष्टांत से कैसे समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): टीकाकारों (श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर) के अनुसार 'स्वभाव' का मूल अर्थ 'अनादि अविद्या' है, जिससे जीव में देहाध्यास और वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा, वक्ता बैंक की स्वचालित वेतन प्रणाली का उदाहरण देकर बताते हैं कि जैसे कंपनी का मालिक हर कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से नकद नहीं बाँटता बल्कि स्वचालित व्यवस्था के तहत पैसे बैंक खाते में चले जाते हैं, वैसे ही भगवान ने एक निष्पक्ष कर्म-फल व्यवस्था बनाई है जो जीव के कर्म और प्रारब्ध के अनुसार फल देती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि स्वभाव का मूल अविद्या है, और भगवान स्वैच्छिक विषमता से किसी को फल नहीं बाँटते बल्कि अपनी सर्वसमता बनाए रखते हुए अपनी व्यवस्था द्वारा कर्मानुसार फल दिलाते हैं।