भ. गी. 5.14

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥

अनुवाद

ईश्वर जीव की कर्तृत्व-भावना, कर्म एवं उसके फल के संयोग को उत्पन्न नहीं करते हैं । अपितु जीव का स्वभाव ही इसमें कार्य करता है* ।

टिप्पणियाँ

* यहाँ भाव यह है कि भगवान् जीवों पर कर्तापन की धारणा आरोपित नहीं करते और न ही वे उनके कर्मों अथवा कर्मफलों के लिए उत्तरदायी हैं। वास्तव में, कर्तापन का मिथ्या भाव आत्मा के वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से उत्पन्न होता है। उस बद्ध अवस्था में व्यक्ति भौतिक सुख की आसक्ति अथवा दुःख को दूर करने की इच्छा से कर्म करने के लिए प्रेरित होता है। इसके अतिरिक्त, कर्म के फल कर्म-सिद्धांत के अनुसार प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.१३ ("सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी...") की व्याख्या के अनुसार, 'कैटालिस्ट' (उत्प्रेरक) के दृष्टांत द्वारा आत्मा की निष्क्रियता को कैसे समझाया गया है, तथा शास्त्र में बताए गए कर्ता के तीन प्रकारों के संदर्भ में आत्मा की वास्तविक स्थिति क्या बतलाई गई है?

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