भगवद्गीता के श्लोक ५.१५ ("नादत्ते कस्यचित् पापम्...") की व्याख्या के अनुसार, अब्राहमिक धर्मों (ईसाई/जुडाइज्म) के 'ओरिजिनल सिन' (मूल पाप) के सिद्धांत की तुलना में भारतीय दर्शन परंपरा में जीवों के बंधन और दुख का मूल कारण क्या बतलाया गया है, तथा श्लोक में 'अज्ञान' का क्या तात्विक स्वरूप (भ्रम ज्ञान) समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि भारतीय दर्शनों में बंधन का मूल कारण किसी अन्य का 'ओरिजिनल सिन' (मूल पाप) नहीं, बल्कि जीव का अपना 'अज्ञान' है। इसके साथ ही, 'अज्ञान' का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं (क्योंकि अभाव से प्रकाश नहीं ढका जा सकता), बल्कि 'भ्रम ज्ञान' है—जहाँ जीव "मैं आत्मा नहीं हूँ" और "मैं शरीर हूँ" ऐसा मानकर मोहग्रस्त हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भारतीय दर्शन किसी दूसरे के किए पाप को हम पर लादना नहीं मानता, और अज्ञान को अभाव नहीं बल्कि भ्रम ज्ञान बतलाया गया है।
भगवद्गीता के श्लोक ५.१६ ("ज्ञानेन तु तदज्ञानं...") की व्याख्या के अनुसार, सूर्य के प्रकाश के दृष्टांत द्वारा आत्मज्ञान के प्रकट होने की क्या प्रक्रिया समझाई गई है, तथा श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी की टीका के अनुसार अज्ञान का नाश करने वाले 'ज्ञान' का क्या विशिष्ट अर्थ बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि सूर्य का प्रकाश वस्तुओं का निर्माण नहीं करता और न ही आत्मा के भीतर बाहर से नया ज्ञान भरा जाता है; और न ही 'ज्ञान' का अर्थ भौतिक डिग्रियाँ हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि सूर्य का प्रकाश नई वस्तुएँ नहीं बनाता बल्कि अंधकार हटाकर विद्यमान वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार अविद्या हटने पर आत्मा का नित्य स्वरूप-ज्ञान प्रकट हो जाता है। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी की टीका के अनुसार 'ज्ञानेन' का अर्थ सत्वगुणमयी 'विद्या' है जो अविद्या का नाश करती है और जीव के अप्राकृत स्वरूप-ज्ञान को प्रकाशित करती है।