भ. गी. 5.15

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥

अनुवाद

सर्वव्यापी ईश्वर किसी के पाप या पुण्य में लिप्त नहीं होते । परन्तु जीव मोहग्रस्त रहते हैं क्योंकि उनका आत्मज्ञान अविद्या (माया शक्ति) से आवृत रहता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.१५ ("नादत्ते कस्यचित् पापम्...") की व्याख्या के अनुसार, अब्राहमिक धर्मों (ईसाई/जुडाइज्म) के 'ओरिजिनल सिन' (मूल पाप) के सिद्धांत की तुलना में भारतीय दर्शन परंपरा में जीवों के बंधन और दुख का मूल कारण क्या बतलाया गया है, तथा श्लोक में 'अज्ञान' का क्या तात्विक स्वरूप (भ्रम ज्ञान) समझाया गया है?

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