भ. गी. 5.16

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥

अनुवाद

परन्तु जिनकी अविद्या विद्या के कारण नष्ट हो गयी है, उनकी विद्या अप्राकृत आत्मज्ञान को ठीक उसी प्रकार प्रकाशित करती है, जैसे सूर्य संसार को प्रकाशित करता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.१५ ("नादत्ते कस्यचित् पापम्...") की व्याख्या के अनुसार, अब्राहमिक धर्मों (ईसाई/जुडाइज्म) के 'ओरिजिनल सिन' (मूल पाप) के सिद्धांत की तुलना में भारतीय दर्शन परंपरा में जीवों के बंधन और दुख का मूल कारण क्या बतलाया गया है, तथा श्लोक में 'अज्ञान' का क्या तात्विक स्वरूप (भ्रम ज्ञान) समझाया गया है?

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