भ. गी. 6.10

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥

अनुवाद

योगी को अकेले ही निर्जन स्थान में निरन्तर रहते हुए, मन और शरीर को संयमित करके, इच्छाओं से रहित और परिग्रह की मानसिकता से मुक्त होकर, अपने मन को ध्यानमग्न करना चाहिए।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.९ ("सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु...") की व्याख्या के अनुसार, ९ प्रकार के चेतन व्यक्तियों के प्रति समता में 'सुहृद्, मित्र, उदासीन और मध्यस्थ' के बीच क्या सूक्ष्म अंतर बतलाया गया है, तथा प्रह्लाद जी द्वारा मध्यस्थता का क्या अनुपम उदाहरण दिया गया है?

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