स्वच्छ और पवित्र स्थान में योगी को स्थिर आसन स्थापित करना चाहिए जो न अधिक ऊँचा हो एवं न अधिक नीचा हो और जो कुश घास से बना हो, जिसे मृगचर्म और मुलायम कपड़े से ढका गया हो। उस आसन पर बैठकर मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए, मन और इन्द्रियों को संयमित करके, उसे हृदय की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए।
भगवद्गीता के श्लोक ६.११-१२ ("शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः...") की व्याख्या के अनुसार, ध्यानयोगी के लिए आसन की स्थापना और वस्त्रों के सही क्रम (नीचे से ऊपर) के संबंध में 'पाठ-क्रमात् अर्थ-क्रमः बलवान्' नियम का क्या तात्विक प्रयोग समझाया गया है, तथा इस ध्यान-अभ्यास का मुख्य उद्देश्य क्या बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि वस्त्रों का यह क्रम व्यावहारिक व आध्यात्मिक दृष्टि से अनुपयुक्त है, और सिद्धियाँ आध्यात्मिक प्रगति में बाधा होती हैं, उद्देश्य नहीं।
विकल्प ख (सही): श्लोक में 'चैलाजिनकुशोत्तरम्' पाठ आया है, किंतु वक्ता 'पाठ-क्रमात् अर्थ-क्रमः बलवान्' न्याय से स्पष्ट करते हैं कि कुशा तीखी होती है, अतः सबसे नीचे कुशा, फिर ऊनी/चर्म वस्त्र और सबसे ऊपर कोमल कपड़ा (चैल) रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, पतंजलि योगसूत्र व गीता के अनुसार ध्यान का उद्देश्य केवल 'आत्मविशुद्धये' (चित्त की शुद्धि) है, न कि भौतिक सिद्धियों का अर्जन जो वास्तव में समाधि में विघ्न/रोड़ा हैं।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१३ ("समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः...") की व्याख्या के अनुसार, शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखने के भौतिक/आत्मिक नियम के साथ-साथ जाजली मुनि और तुलाधार वैश्य की कथा से क्या मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा समझाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.१३ के अनुसार ध्यान में शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखना अनिवार्य है ताकि शरीर संतुलित रहे और मन स्थिर हो सके। वक्ता महाभारत से जाजली मुनि का उदाहरण देते हैं कि वर्षों तक स्थिर खड़े रहने के बावजूद जब उनके मन में अपनी साधना का अभिमान आया, तब आकाशवाणी ने उन्हें बनारस के तुलाधार व्यापारी के पास भेजा, जिसने सिखाया कि साधना का फल चित्त-शुद्धि और गर्व-हीनता (अमानीपन) है, न कि श्रेष्ठता का अहंकार।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि ध्यान में चंचलता मना है, और तुलाधार कथा का उद्देश्य व्यापार की श्रेष्ठता बताना नहीं बल्कि साधना में अहंकार-शून्यता का महत्त्व समझाना है।