भ. गी. 6.9
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
अनुवाद
जो व्यक्ति शुभचिन्तक, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष-पात्र, सम्बन्धी, पुण्यशाली और यहाँ तक कि पापियों – सभी को समान दृष्टि से देखता है, वह योग में अत्यन्त सिद्ध माना जाता है।
जो व्यक्ति शुभचिन्तक, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष-पात्र, सम्बन्धी, पुण्यशाली और यहाँ तक कि पापियों – सभी को समान दृष्टि से देखता है, वह योग में अत्यन्त सिद्ध माना जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि सुहृद् बिना पक्षपात के सबका हित चाहता है, उदासीन झगड़ों से दूर रहता है, और प्रह्लाद जी ने पुत्र का मोह छोड़कर निष्पक्ष निर्णय दिया था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, श्लोक ६.९ में चेतन व्यक्तियों के साथ समता की चर्चा है। सुहृद् (जैसे भगवान) बिना किसी व्यक्तिगत स्नेह के भी सबका कल्याण चाहता है, जबकि मित्र स्नेह के कारण परोपकार करता है। उदासीन किसी के झगड़े में नहीं पड़ता (ऊपर आसीन रहता है), जबकि मध्यस्थ (मीडिएटर) निष्पक्ष होकर विवाद को शांत कराना चाहता है। इसका उदाहरण प्रह्लाद जी हैं, जिन्होंने अपने पुत्र विरोचन और ऋषि-पुत्र के विवाद में निष्पक्ष होकर ऋषि-पुत्र को श्रेष्ठ बतलाया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि ध्यान में विक्षेप दो कारणों से आते हैं—आंतरिक और बाह्य। अपनी आशाओं व इच्छाओं को शांत करना 'निराशी' (आंतरिक विक्षेप मुक्ति) है तथा कम से कम वस्तुओं/संबंधों का संग्रह करना 'अपरिग्रह' (बाह्य विक्षेप मुक्ति) है। इसके अतिरिक्त, 'एकाकी' का वास्तविक तात्पर्य मन से सांसारिक भीड़ (आसक्ति) को बाहर निकालना है; ऐसा व्यक्ति भीड़ में भी अकेला (स्व-स्वरूप में स्थित) रह सकता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि केवल बाह्य रूप से गुफा में बैठने या अकेले रहने से कोई एकाकी नहीं होता यदि मन में संसार भरा हो; और निराशी का अर्थ भोजन त्यागना नहीं बल्कि तृष्णा/इच्छाओं का शमन है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।