भ. गी. 6.13-14

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥

अनुवाद

शरीर, सिर और गर्दन को सीधा तथा अचल रखते हुए, स्थिर रहकर, दृष्टि को नाक के अग्रभाग पर टिकाए हुए, बिना इधर-उधर देखे, मन को शान्त रखते हुए, भयमुक्त होकर, ब्रह्मचर्य व्रत का दृढ़ता से पालन करते हुए, मन को संयमित कर मुझमें स्थिर करके, केवल मेरा परायण होकर, योगी को मुझमें पूर्णतया ध्यान-मग्न रहते हुए बैठना चाहिए।

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प्रश्न 1, कुल 4

भगवद्गीता के श्लोक ६.११-१२ ("शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः...") की व्याख्या के अनुसार, ध्यानयोगी के लिए आसन की स्थापना और वस्त्रों के सही क्रम (नीचे से ऊपर) के संबंध में 'पाठ-क्रमात् अर्थ-क्रमः बलवान्' नियम का क्या तात्विक प्रयोग समझाया गया है, तथा इस ध्यान-अभ्यास का मुख्य उद्देश्य क्या बतलाया गया है?

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