भ. गी. 6.15

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥

अनुवाद

इस प्रकार अपना मन निरन्तर मुझमें ध्यानपूर्वक स्थिर रखकर मन को संयमित करने वाला योगी परम मुक्ति (ब्रह्मनिर्वाण) रूपी शान्ति को प्राप्त करता है और मेरे धाम पहुँच जाता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.१५ ("युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः...") की व्याख्या के अनुसार, ध्यानयोग के अभ्यास में 'सदा' और 'नियतमानसः' शब्दों का क्या व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है, तथा श्लोक में वर्णित 'शान्तिं निर्वाणपरमाम्' और 'मत्संस्थाम्' का क्या तात्विक स्वरूप बतलाया गया है?

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