नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
अनुवाद
हे अर्जुन, जो व्यक्ति अत्यधिक खाता है या अत्यधिक उपवास करता है, और जो अत्यधिक सोता है या अत्यधिक जागरण करता है, ऐसे व्यक्ति के लिए योगाभ्यास का प्रश्न ही नहीं उठता।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१५ ("युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः...") की व्याख्या के अनुसार, ध्यानयोग के अभ्यास में 'सदा' और 'नियतमानसः' शब्दों का क्या व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है, तथा श्लोक में वर्णित 'शान्तिं निर्वाणपरमाम्' और 'मत्संस्थाम्' का क्या तात्विक स्वरूप बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान में वक्ता बताते हैं कि आध्यात्मिक जीवन 'सदा' (सतत) जीने का मार्ग है, न कि केवल वीकेंड पर करने वाला अभ्यास। 'नियतमानसः' का अर्थ मन को अपने नियंत्रण में ले आना है। इसके फल स्वरूप मिलने वाली 'निर्वाण परम शांति' व 'मत्संस्था' (भगवद्-धाम/स्वरूप) वह स्थिर मानसिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति बाहर के वातावरण, शोर या शब्द-बाणों से कभी विचलित नहीं होता।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'सदा' का अर्थ केवल ५ मिनट का अभ्यास नहीं है और न ही 'मत्संस्थाम्' का संबंध भौतिक धन-प्रतिष्ठा से है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१६ और ६.१७ ("नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति... युक्ताहारविहारस्य...") की व्याख्या के अनुसार, आहार और निद्रा के संतुलन का क्या नियम बतलाया गया है, तथा आयुर्वेद के अनुसार पेट भरने का सही अनुपात एवं 'आहार' व 'अवबोध' पदों का क्या व्यापक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.१६-१७ में अति भोजन, अति उपवास, अति निद्रा और अति जागरण का निषेध किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार पेट का आधा भाग अन्न से, एक चौथाई जल से तथा एक चौथाई वायु के लिए खाली रखना चाहिए। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि 'आहार' का व्यापक अर्थ इंद्रियों के माध्यम से भीतर ग्रहण किया जाने वाला हर विषय है। 'अवबोध' का अर्थ जागते, सोते, खाते और कर्म करते समय पूर्ण जागरूकता (स्वाध्याय व चेतना) बनाए रखना है, जो समस्त दुखों का नाश करती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अति भोजन और अति निद्रा योग में बाधक बतलाई गई है, और 'आहार' का अर्थ केवल सप्लीमेंट लेना नहीं है।